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ग़ज़ल
दिल के दफ़्तर में वो मंज़र आज भी महफ़ूज़ है
गर्म कॉफ़ी बालकोनी सर्दियाँ बारिश की शाम
शीराज़ सागर
ग़ज़ल
चाय के दो कप बॉलकनी और 'फ़ैज़' की नज़्में
तुम बिन भी ये मा'मूल हमारा जारी है
रिज़्वाना बानो इक़रा
नज़्म
जान प्यारी है
बॉलकनी में रखे पिंजरे के पास आ कर
मिरी मैना से सरगोशी के लहजे में


