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नज़्म
आवारा
इक महल की आड़ से निकला वो पीला माहताब
जैसे मुल्ला का अमामा जैसे बनिए की किताब
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मुफ़्लिसी
कपड़े मियाँ के बनिए के घर में पड़े रहे
जब कड़ियाँ बिक गईं तो खंडर में पड़े रहे
नज़ीर अकबराबादी
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नज़्म
भूका बंगाल
भूका है बंगाल रे साथी भूका है बंगाल
कोठरियों में गाँजे बैठे बनिए सारा अनाज
वामिक़ जौनपुरी
नज़्म
दूसरे दर्जे की पिछली क़तार का आदमी
गोश्त मछली सब्ज़ियाँ बनिए का राशन दूध घी
मुझ को खाती हैं ये चीज़ें मैं ने कब खाया इन्हें
शकील आज़मी
ग़ज़ल
इश्क़ तो कर लें मगर इस में है नुक़सान बहुत
हम वो बनिए हैं जो भरपाई से घबराते हैं
उबैद नजीबाबादी
ग़ज़ल
आप भी 'अहमद' फ़क़त नासेह न बनिए कीजे कुछ
हर अदा हुस्न-ए-अदा हो हर सुख़न हुस्न-ए-सुलूक
मोहम्मद अहमद
ग़ज़ल
गले में डाल कर ज़ुन्नार क़श्क़ा खींच माथे पर
बरहमन बनिए और तौफ़-ए-दर-ए-बैतुस्सनम कीजे
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
हो ग़ल्ला-ए-ख़िल्क़त से न सौदा-ए-मोहब्बत
है इश्क़ की दुक्कान सो बनिए की नहीं हाट


