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ग़ज़ल
नासिर काज़मी
ग़ज़ल
बीता दीद उम्मीद का मौसम ख़ाक उड़ती है आँखों में
कब भेजोगे दर्द का बादल कब बरखा बरसाओगे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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विषय
बरहम
बरहम शायरी
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barkhaa
बरखा بَرْکھا
बरसात, वर्षा, वर्षा-ऋतु, बौछार, लगातार कोई चीज़ किसी पर फेंकने की स्थिती, आकाश से जल बरसना
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ग़ज़ल
बहुत सँभाला वफ़ा का पैमाँ मगर वो बरसी है अब के बरखा
हर एक इक़रार मिट गया है तमाम पैग़ाम बुझ गए हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
तीन आवाज़ें
फ़स्ल-ए-गुल आएगी नमरूद के अँगार लिए
अब न बरसात में बरसेगी गुहर की बरखा
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मरसिए
बीता दीद उम्मीद का मौसम ख़ाक उड़ती है आँखों में
कब भेजोगे दर्द का बादल कब बरखा बरसाओगे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
अब की रुत में जब धरती को बरखा की महकार मिले
मेरे बदन की मिट्टी को भी रंगों में नहला देना
रईस फ़रोग़
ग़ज़ल
ये दुख-दर्द की बरखा बंदे देन है तेरे दाता की
शुक्र-ए-नेमत भी करता जा दामन भी फैलाता जा
हफ़ीज़ जालंधरी
नज़्म
तुम याद मुझे आ जाते हो
जब बरखा की रुत आती है जब काली घटाएँ उठती हैं
जिस वक़्त कि रिंदों के दिल से हू-हक़ की सदाएँ उठती हैं
बहज़ाद लखनवी
ग़ज़ल
बरखा की तो बात ही छोड़ो चंचल है पुर्वाई भी
जाने किस का सब्ज़ दुपट्टा फेंक गई है धानों पर
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
हक़ीक़त
न बरखा-रुत की सियाह रातों में
रास्ता भूल कर भटकती हुई सजल नारियों के झुरमुट




