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ग़ज़ल
गुफ़्तम कि 'फ़ाएज़' आया गुफ़्ता कि ख़ैर-मक़्दम
गुफ़्तम कुजास्त जा-अश गुफ़्ता कि बर-सर-ए-दर
फ़ाएज़ देहलवी
ग़ज़ल
जो 'इश्क़ में बर-सर-ए-दार हुआ सरदार वही सरशार हुआ
सरमस्त विसाल-ए-यार हुआ किस तरह कहें मंसूर नहीं
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
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ग़ज़ल
देख कर शौक़-ए-शहादत बर-सर-ए-मक़्तल मिरा
क़ातिलों ने हाथ से घबरा के ख़ंजर रख दिए
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
ग़ज़ल
तुम इसे कह लो हिसाब-ए-दोस्ताँ-दर-दिल 'फ़ज़ा'
हम ने अपना नफ़अ' भी लौह-ए-ज़ियाँ पर लिख दिया