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नज़्म
तीन आवाज़ें
सर्व-क़द मिट्टी के बौनों के क़दम चूमेंगे
फ़र्श पर आज दर-ए-सिदक़-ओ-सफ़ा बंद हुआ
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ग़ज़ल
क़द बढ़ाने के लिए बौनों की बस्ती में चलो
ये नहीं मुमकिन तो फिर बच्चों की बस्ती में चलो
इमाम आज़म
ग़ज़ल
गुफ़्तुगू किस से करें बौनों की बस्ती में 'ख़ुमार'
बात करनी है तो हम-सर भी मुझे चाहिए है
सुलेमान ख़ुमार
ग़ज़ल
बहुत झुक झुक के चलता हूँ मैं इन बौनों की बस्ती में
ये छोटा-पन कभी मुझ को बड़ा होने नहीं देता
मोहम्मद आज़म
नज़्म
आलमों को बन बास देने वाले
बौनों की सना में बे-ख़ुद हैं
अपने जी का सौदा कर के लोगों की मलामत सहते हैं
अबु बक्र अब्बाद
ग़ज़ल
चलो घर से तो बौनों के सिवा मिलता नहीं कोई
कहाँ हैं वो जिन्हें क़द के बराबर देख सकते थे
फ़ारूक़ नूर
नज़्म
एक न्यूक्लेयर नज़्म
इन्हीं बौनों की ख़ातिर लाए हैं अब हम सुकूत अपना
कि हम ख़ामोश बैठे हैं



