आपकी खोज से संबंधित
परिणाम "bazm-e-do-shamba"
अत्यधिक संबंधित परिणाम "bazm-e-do-shamba"
ग़ज़ल
जिस की आँखों ने किया बज़्म-ए-दो-आलम को ख़राब
कोई उस फ़ित्ना-ए-दौराँ से कहो इश्क़ अल्लाह
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
ज़रा सा दिल है लेकिन जान है बज़्म-ए-दो-आलम की
ये सारी गर्मी-ए-हंगामा क़ल्ब-ए-ना-तवाँ तक है
अब्दुर्रशीद ख़ान कैफ़ी महकारी
नज़्म
गुरेज़
ये जा कर कोई बज़्म-ए-ख़ूबाँ में कह दो
कि अब दर-ख़ोर-ए-बज़्म-ए-ख़ूबाँ नहीं मैं
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
बादा-नोशी में अगर हुस्न-ए-अक़ीदत है शरीक
बज़्म-ए-साक़ी सज्दा-गाह-ए-दो-जहाँ हो जाएगी
मसूद मैकश मुरादाबादी
पृष्ठ के संबंधित परिणाम "bazm-e-do-shamba"
अन्य परिणाम "bazm-e-do-shamba"
ग़ज़ल
ये बज़्म-ए-रंग-ओ-बू है जो हम से सजी हुई
लुट जाएगी ये बज़्म घड़ी दो घड़ी के बाद
