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ग़ज़ल
तुम्हारे हुक्म की ता'मील बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तर होगी
न दामन मेरा नम होगा न मेरी आँख तर होगी
रज़ी बदायुनी
ग़ज़ल
बे-ख़ौफ़-ए-ग़ैर दिल की अगर तर्जुमाँ न हो
बेहतर है इस से ये कि सिरे से ज़बाँ न हो
मौलाना मोहम्मद अली जौहर
ग़ज़ल
जुनूँ को चाहिएँ बे-ख़ौफ़-ओ-आ'ली-ज़र्फ़ दीवाने
हर इक दीवार में ज़िंदाँ की हो सकते हैं दर पैदा
बलदेव राज
ग़ज़ल
माना कि थी ग़मगीन कली ख़ौफ़-ए-ख़िज़ाँ से
चुप रह के बहारों ने भी दिल तोड़ दिया है
महेश चंद्र नक़्श
हास्य
रोज़ बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तर महफ़िल-ए-अग़्यार में भौंक
मौक़ा मिल जाए तो यूरोप के सेमिनार में भौंक
मुख़तसर आज़मी
ग़ज़ल
कौन सच बोलता है ज़ालिम-ओ-जाबिर के ख़िलाफ़
काम दुनिया में ये बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तर हम ने किया