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ग़ज़ल
बे-ख़ुद-ए-इश्क़ से फिर होश में आया न गया
सर जो सज्दे में झुकाया तो उठाया न गया
सय्यद बशीर हुसैन बशीर
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ग़ज़ल
मस्त-ओ-बे-ख़ुद तेरे मय-ख़ाने का बाम-ओ-दर बने
साक़िया गर तेरी चश्म-ए-मस्त का साग़र बने
ख़ुशी मोहम्मद नाज़िर
ग़ज़ल
मंज़िल-ए-इश्क़ से गुज़र बे-ख़ुद-ओ-मस्त-ओ-बे-ख़बर
चोट लगे तो उफ़ न कर दिल को दबा के भूल जा
ख़ुमार बाराबंकवी
ग़ज़ल
आलम-ए-रंग-ओ-नग़्मा में कैफ़ बहुत सही मगर
बे-ख़ुद-ए-सैर-ए-काएनात अपनी तरफ़ भी इक नज़र
सय्यदा अख़्तर
नज़्म
सानेहा
इक बे-खु़द-ए-सुरूर-ए-दिल-ओ-जाँ नहीं रहा
इक आशिक़-ए-सदाक़त-ए-पिन्हाँ चला गया
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
बज़्म-ए-मय बे-ख़ुद-ओ-बे-ताब न क्यूँ हो साक़ी
मौज-ए-बादा है कि दर्द उठता है पैमानों में
