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ग़ज़ल
पार ख़ुद ही कर दिया अमवाज-ए-तूफ़ाँ ने मुझे
'मौज' मैं ने ख़ुद को जब बे-दस्त-ओ-बे-पा कर दिया
राजेन्द्र बहादुर माैज
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नज़्म
बे-ख़्वाबी की आकास बेल पर खिली ख़्वाहिश
मुझ को सोने दो
सदियों जैसी गहरी लम्बी नींद
नसीर अहमद नासिर
ग़ज़ल
मा'सूम से दो दिल क्या धड़के बे-पर की उड़ाई लोगों ने
ख़ामोश मोहब्बत भड़का दी वो आग लगाई लोगों ने
जावेद वशिष्ट
शेर
ब-पास-ए-दिल जिसे अपने लबों से भी छुपाया था
मिरा वो राज़ तेरे हिज्र ने पहुँचा दिया सब तक
क़तील शिफ़ाई
शेर
ब-पास-ए-एहतिराम-ए-इश्क़ हम ख़ामोश हैं वर्ना
परेशाँ कर भी सकते हैं परेशाँ हो भी सकते हैं

