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ग़ज़ल
रौनक़-ए-हस्ती है इश्क़-ए-ख़ाना वीराँ साज़ से
अंजुमन बे-शमा है गर बर्क़ ख़िर्मन में नहीं
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
मजलिस-ए-बे-शम्अ' वो हैं शम-ए-बे-मजलिस हूँ मैं
ग़म मिरा अहबाब को है मुझ को ग़म अहबाब का
मुनीर शिकोहाबादी
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shar'a ke KHilaaf karnaa
शर'अ के ख़िलाफ़ करना شَرْع کے خِلاف کَرنا
इस्लाम के क़ानून के ख़िलाफ़ कोई बात करना
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शेर
कैसा ये दिन है जो नहीं लाता है रू-ब-शाम
कैसी ये शब है जिस की सहर ना-पदीद है
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
वही बे-यक़ीनी की है फ़ज़ा वही गर्द-बाद-ए-शुमाल है
मैं चराग़-ए-जाँ हूँ लिए हुए वही शाम-ए-शहर-ए-मलाल है
शमा ज़फर मेहदी
शेर
शम्अ के मानिंद अहल-ए-अंजुमन से बे-नियाज़
अक्सर अपनी आग में चुप चाप जल जाते हैं लोग
हिमायत अली शाएर
ग़ज़ल
पिघलती शम्अ से मैं ख़ुद को बे-ख़बर कर लूँ
ग़ज़ल को फ़िक्र की हिद्दत से मो'तबर कर लूँ