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ग़ज़ल
मय-ख़ाने में और तो क्या था हम-ज़ख्मों की महफ़िल थी
बेचारों से शुरूअ हुई थी ख़त्म हुई बेचारों तक
प्रबुद्ध सौरभ
ग़ज़ल
कूचे से निकलवाते हो अबस हम ऐसे वतन-आवारों को
रहने दो पड़े हैं एक तरफ़ दुख देते हो क्यूँ बे-चारों को