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शेर
हर एक जवाहर बेश-बहा चमका तो ये पत्थर कहने लगा
जो संग तिरा वो संग मिरा तू और नहीं मैं और नहीं
शाद लखनवी
ग़ज़ल
ये लाल-ए-लख़्त-ए-जिगर है वो लाल-ए-बेश-बहा
कि काम करती नहीं चश्म-ए-जौहरी जिस में
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
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ग़ज़ल
माल मताअ' तो छोड़ आए थे बेश-बहा इक चीज़ थी बस
सो पाई अनमोल विरासत उर्दू बोलने वाला हूँ
वजीह सानी
ग़ज़ल
यही 'फ़ाख़िर' का असासा है तो है मुझ को 'अज़ीज़
इस से बेहतर नहीं शय बेश-बहा कुछ भी नहीं
अहमद फ़ाख़िर
ग़ज़ल
ये भी ख़्वाहिश है कि कुछ लोग मुख़ालिफ़ हों मिरे
वर्ना अहबाब तो मैं बेश-बहा रखता हूँ
यासिर अबुल आस
नज़्म
दिल-ए-साफ़ी
गिरह में हूँ रौशें बेश-बहा पत्थर की
साफ़ ऐसी कि न रतनका भी नज़र आए वहाँ
सूरज नारायण मेहर
ग़ज़ल
हर एक जवाहिर बेश-बहा चमका तो ये पत्थर कहने लगा
जो संग तिरा वो संग मिरा तू और नहीं मैं और नहीं
शाद लखनवी
ग़ज़ल
तुम ने मुझ में जो कुछ खोया उस की क़ीमत तुम जानो
मैं ने तुम से जो कुछ पाया है वो बेश-बहा जानम
अनीस अंसारी
ग़ज़ल
हैरत है अबस ऐ जो इन बेश-बहा मंसूबों पर
इस तरह के मोती तब निकले जब ज़ेर-ए-ज़मीं मैं डूब गया
शाद अज़ीमाबादी
नज़्म
सिगरेट और पान का मुकालिमा
कौन सी ऐसी हैं ख़िदमात तिरी बेश-बहा
ख़ूँ-बहा क्यूँ लब-ओ-दंदान-ए-हसीनाँ से लिया
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
हिण्डोला
रुमूज़-ए-बेश-बहा ठेठ आदमियत के
कहानियाँ थीं कि सद-दर्स-गाह-ए-रिक़्क़त-ए-क़ल्ब