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नज़्म
प्रोफ़ेसर
और रात को बच्चों को किसी बात पे धप के
मक्खी की तरह बीवी से भन-भन में मिलेगा
रज़ा नक़वी वाही
नज़्म
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और रात को बच्चों को किसी बात पे धप के
मक्खी की तरह बीवी से भन-भन में मलेगा
रज़ा नक़वी वाही
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नज़्म
श्री-कृष्ण
द्वारका-धीश कहीं बन के मुकुट सर पे रखा
काली कमली रही जंगल में सर-ए-दोश कहीं
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
ग़ज़ल
दम का क्या ठीक है दम-भर में है दम-भर में नहीं
चलते फिरते मिरी बालीं पे ज़रा हो जाना
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
ग़ज़ल
ख़याल-ए-यार ने मरक़द पे कर दी नूर की बारिश
मुक़द्दर का सितारा बन गया दाग़-ए-जिगर अपना
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
ग़ज़ल
उम्र भर ख़ाना-ए-ख़ुम्मार में सर-ख़ुश रहते
ज़िंदगी का यही पैमाना बनाया होता
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
हिन्दू मुसलमानों का इत्तिहाद
आपस की फूट से हो क्यूँ दिल-फ़िगार दोनों
हाँ छोड़ दो ये रंजिश बन जाओ यार दोनों
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
शेर
अदाओं का कुछ इस अंदाज़ से पर्दा उठा देना
लजाना कसमसाना देख लेना मुस्कुरा देना
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
ग़ज़ल
साजन के स्वागत को सूरज लाया भर भर थाली धूप
ख़ुश हो कर दोनों हाथों से चारों ओर उछाली धूप
सुलताना मेहर
ग़ज़ल
क्या हुस्न है यूसुफ़ भी ख़रीदार है तेरा
कहते हैं जिसे मिस्र वो बाज़ार है तेरा




