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ग़ज़ल
वफ़ा का यूँ तो दम भरते हैं इस दुनिया में सब लेकिन
वफ़ा के नाम पर मिट कर दिखाना किस को आता है
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
मैं हूँ वो तस्वीर जिस में हादसे भरते हैं रंग
ख़ाल-ओ-ख़त खुलते हैं मेरे ख़ंजरों के दरमियाँ
बशीर फ़ारूक़ी
नज़्म
होली की बहारें
महबूब नशे में छकते हों तब देख बहारें होली की
हो नाच रंगीली परियों का बैठे हों गुल-रू रंग-भरे
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
तुम याद मुझे आ जाते हो
जब चौदहवीं शब का चाँद निकल कर दहर मुनव्वर करता है
जब कोई मोहब्बत का मारा कुछ ठंडी साँसें भरता है
बहज़ाद लखनवी
ग़ज़ल
'शाइर' उन की दोस्ती का अब भी दम भरते हैं आप
ठोकरें खा कर तो सुनते हैं सँभल जाते हैं लोग










