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नज़्म
जंग का अंजाम
बहू कहे अपना घर कैसा याँ तो अपने भी हैं पराए
सास कहे जल-भुन के उसे तो राज-महल भी रास न आए
मीराजी
ग़ज़ल
वो फ़ाख़्ता थी जिसे गोलियों ने भून दिया
ये क़त्ल सेहन-ए-गुलिस्ताँ में जारेहाना हुआ
पी पी श्रीवास्तव रिंद
नज़्म
मज़दूर की ज़िंदगी
जल रहा है सब्ज़ा-ए-बे-रंग फ़र्श-ए-ख़ाक पर
भुन रहा है धूप की तेज़ी से गेती का जिगर
शातिर हकीमी
ग़ज़ल
वो दोनों तो रब्त-ए-बाहमी से जुड़े हुए थे
मैं क्यूँ रक़ाबत के इस जहन्नम में भुन रहा हूँ
मुसव्विर सब्ज़वारी
ग़ज़ल
ख़ुदा को इल्म है ज़िंदा है या जल-भुन गया शब को
दिल अपना तेरे परवानों में शामिल हम भी रखते थे
आग़ा हज्जू शरफ़
ग़ज़ल
ऐ 'मुसहफ़ी' जल-भुन के हुआ ख़ाक में सारा
दिखलावेगी अब क्या तपिश-ए-दिल नहीं मालूम
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
ख़ाक जल-भुन के तो हो जाएगा चर्ख़-ए-बद-बीं
नाला कर बैठे जो दिल-सोख़्त-गान-ए-देहली


