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नज़्म
ख़ातून-ए-मशरिक़
आलम-ए-निस्वाँ पे काली रात जब छा जाएगी
ये तिरे माथे की बिंदी सुब्ह को शरमाएगी
जोश मलीहाबादी
नज़्म
जुदाई
किरन सुहाग की बिंदी की लहलहाई हुई
वो अँखड़ियों का फ़ुसूँ रूप की वो देविय्यत
फ़िराक़ गोरखपुरी
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विषय
बीनाई
बीनाई शायरी
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रेख़्ता शब्दकोश
zindii
ज़िंदी زِنْدی
نور (یزداں) اور ظُلمت (اہرمن) کے نظریے کا یا عقیدے کا قائل ، دہریہ ، بے دین ، وہ شخص جو نُور اور تاریکی کے اصول کا معتقد ہو.
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ग़ज़ल
ये लाली और बिंदी 'रीत' क्यों भाते नहीं तुम को
इसी श्रंगार से तो जिस्म औरत का सँवरता है
ऋतु सिंह राजपूत रीत
ग़ज़ल
वो पायल पाँव में तेरे वो बिंदी तेरे माथे पर
तसव्वुर बस यही अक्सर मेरी आँखों में होता है
सुजीत सहगल हासिल
ग़ज़ल
शाद आरफ़ी
नज़्म
कल से आज तक
कि जिस के माथे की सुर्ख़ बिंदी मिरा नसीबा जगा रही थी
कि जिस की नज़रों से मैं ने यकसानियत की मय पी
दौर आफ़रीदी
ग़ज़ल
बा'द तुम्हारे देख न पाया दर्पन कैसा होता है
चूड़ी बिंदी काजल गजरा कंगन कैसा होता है
देवेश दीक्षित देव
ग़ज़ल
हसन नईम
नज़्म
एक लम्हे की लपक
इन 'आरिज़ पे फैली चमक ये गुलाबी
भौओं को मिलाती ये छोटी सी बिंदी


