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रेख़्ती
होते थे दो-चार दूल्हा पहले क्या क्या प्यार से
बिगड़े अब क्या क्या बुआ दो चार ही सालों के बीच
मोहसिन ख़ान मोहसिन
रेख़्ती
चाँदी तो क्या मैं सोने में मँढवा दूँ ऐ बुआ
हो ढोलने की तुझ को जो क़ुरआन की हवस
मीर यार अली जान
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रेख़्ती
क्यूँ कड़ी सुनते किसी की दिल न आ जाता अगर
क्या करूँ शिकवा बुआ अपने दिल-ए-नादान का
मोहसिन ख़ान मोहसिन
रेख़्ती
फ़तह-ख़ाँ नाम है उस का वो है दुखनी सवारों में
उसी पर मैं हूँ मरती ऐ बुआ बाँधे है जो सेला
मीर यार अली जान
रेख़्ती
बुआ वो जानवर जैसी भेंसा-पारी की कसबी ने
जली हूँ ये मोहब्बत उड़ गई उस बान की सूरत










