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ग़ज़ल
बुलाते क्यूँ हो 'आजिज़' को बुलाना क्या मज़ा दे है
ग़ज़ल कम-बख़्त कुछ ऐसी पढ़े है दिल हिला दे है
कलीम आजिज़
नज़्म
नया जन्म
वही सूरज है लेकिन और ही कुछ जगमगाहट है
न जाने कैसे कैसे फूल अब मुझ को बुलाते हैं
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
नज़्म
ये सराए है
गुज़रा करते हैं सुलगते हुए बाक़ी अय्याम
लोग जब आग लगाते हैं बुझाते भी भी नहीं
इब्न-ए-इंशा
नअत
मज़ा जब है कि हम दीवाना-वार उन की तरफ़ जाएँ
इशारों से शह-ए-हर-दो-सरा हम को बुलाते हों
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
बज़्म-ए-दुश्मन में बुलाते हो ये क्या करते हो
और फिर आँख चुराते हो ये क्या करते हो



