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ग़ज़ल
दिल में छेद कर ख़ून की बूंदों से हर रेज़ा भरे
टूट कर बन जाएँ बूँदे की कटारी चूड़ियाँ
मुनीर शिकोहाबादी
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नज़्म
पहली नज़र
कान में बुंदे सरापा आफ़ताब-ओ-माहताब
पर्दा-दारी क्या कहूँ रुख़ पर तजल्ली की नक़ाब
हसरत जयपुरी
ग़ज़ल
बदन में जामा-ए-ज़र-कश सरापा जिस पे ज़ेब-आवर
कड़े बुंदे छड़े छल्ले अँगूठी नौ-रतन हैकल
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
आसमाँ से क्या ग़रज़ जब है ज़मीं पर ये चमक
माह-ओ-अंजुम से हैं बढ़ कर उन के बुंदे बालियाँ
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
ऐ ज़ोहरा-जबीं नाच
ले देख कि लाया हूँ नई क़िस्म के बुंदे
कल रेशमी सारी भी तिरी नज़्र करूँगा

