आपकी खोज से संबंधित
परिणाम "burj"
अत्यधिक संबंधित परिणाम "burj"
नज़्म
हसन कूज़ा-गर (4)
ज़माना जहाँ-ज़ाद अफ़्सूँ-ज़दा बुर्ज है
और ये लोग उस के असीरों में हैं
नून मीम राशिद
हिंदी ग़ज़ल
तू ढूँढता था जिसे जा के बुर्ज-ए-बाबुल में
वो शख़्स तो किसी मीरा की चश्म-ए-तर में रहा
गोपालदास नीरज
शब्दकोश से सम्बंधित परिणाम
अन्य परिणाम "burj"
ग़ज़ल
लोग हिलाल-ए-शाम से बढ़ कर पल में माह-ए-तमाम हुए
हम हर बुर्ज में घटते घटते सुब्ह तलक गुमनाम हुए
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
फ़बेअय्ये आलाए रब्बिकमा तुकज़्ज़िबान
सारी ज़िंदगी इसी की रोटी खाते हैं
चाहे उन का बुर्ज कोई हो
परवीन शाकिर
ग़ज़ल
फिर भटकता फिर रहा है कोई बुर्ज-ए-दिल के पास
किस को ऐ चश्म-ए-सितारा-याब वापस कर दिया
अब्बास ताबिश
ग़ज़ल
ख़ौफ़ से बुर्ज में जल्लाद-ए-फ़लक छुपता है
तुम जो बाँधे हुए तलवार नज़र आते हो
वज़ीर अली सबा लखनवी
नज़्म
नूर-जहाँ का मज़ार
माह-ए-फ़लक-ए-हुस्न को ये बुर्ज मिला है
ऐ चर्ख़ तिरे हुस्न-ए-नवाज़िश का गिला है
तिलोकचंद महरूम
ग़ज़ल
रुख़ जो ज़ेर-ए-सुंबल-ए-पुर-पेच-ओ-ताब आ जाएगा
फिर के बुर्ज-ए-सुंबले में आफ़्ताब आ जाएगा


