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नज़्म
तस्वीर ओ तसव्वुर
शराब आँखों से ढल रही है, नज़र से मस्ती उबल रही है
छलक रही है उछल रही है, पिए हुए हैं पिला रहे हैं
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
जिसे सुन के रूह महक उठे जिसे पी के दर्द चहक उठे
तिरे साज़ में वो सदा नहीं तिरे मय-कदे में वो मय नहीं
नासिर काज़मी
ग़ज़ल
अब्बास ताबिश
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रेख़्ता शब्दकोश
chaaho
चाहो چاہو
तुम्हारा दिल चाहे, तुम्हारी मर्ज़ी, जो तुम्हें पसंद हो मुख़ाज़िब को दो बातों या कामों में इख़तियार देने या इन दोनों को एक हुक्म में दाख़िल करने के लिए मुस्तामल, या, ख़ाह, चाहे
chaahe
चाहे چاہے
' यदि जी चाहे ' का संक्षिप्त रूप। यदि जी चाहे। यदि मन में आवे। जैसे-(क) चाहे यहाँ रहो, चाहे वहाँ। (ख) जो चाहे सो करो।
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ग़ज़ल
ऐ बुलबुल-ए-दिल यूँ ग़म पी कर मत चहक कि अब लब को सी ले
सब साज़ बुरीदा-हाल हुए अब राग पुराना मुश्किल है
अनीस अब्र
नज़्म
क़त्ल-ए-आफ़्ताब
चटक रही हैं कहीं तीरगी की दीवारें
लचक रही हैं कहीं शाख़-ए-गुल की तलवारें



