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ग़ज़ल
कुलदीप सलील
कुल्लियात
अब चैत गर नहीं कुछ ताज़ा हुआ हूँ बेकल
आया हूँ जब ब-ख़ुद में जी इस में जा रहा है
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
दिल के सहरा पे बरस चैत के बादल की तरह
ख़ुश्क टीले को भी दे फूलती सरसों का मिज़ाज
शेर अफ़ज़ल जाफ़री
शेर
पेड़ों की घनी छाँव और चैत की हिद्दत थी
और ऐसे भटकने में अंजान सी लज़्ज़त थी
ज़ुल्फ़ेक़ार अहमद ताबिश
ग़ज़ल
पेड़ों की घनी छाँव और चैत की हिद्दत थी
और ऐसे भटकने में अंजान सी लज़्ज़त थी

