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ग़ज़ल
तब कहीं कुछ पता चला सिद्क़-ओ-ख़ुलूस-ए-हुस्न का
जब वो निगाहें इश्क़ से बातें बना के रह गईं
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
वस्ल-ए-महबूब की उम्मीद में तेज़ी से चलीं
धड़कनें और ये दीवार-घड़ी शाम के बा'द
सिद्धार्थ सैनी साद
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नज़्म
जुदाई
रगें ज़मीं के मनाज़िर की पड़ चलीं ढीली
ये ख़स्ता-हाली ये दरमांदगी ये सन्नाटा
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
फिर घटाओं में है नक़्क़ारा-ए-वहशत की सदा
टोलियाँ बंध के चलीं दश्त को दीवानों की
एहसान दानिश कांधलवी
ग़ज़ल
उठे ज़लज़ले चलीं आँधियाँ ये चराग़ फिर भी नहीं बुझा
ये करम नहीं किसी और का तिरी रहमतों का कमाल है
नसीम निकहत
ग़ज़ल
चलीं गर्म आँधियाँ सूरज भी चमका ख़ाक-ए-मक़्तल पर
वही ख़ून-ए-शहीदाँ की नमी मालूम होती है
शफ़ीक़ जौनपुरी
हास्य
उन की अम्मी हो चलीं थीं रफ़्ता रफ़्ता हम-ख़याल
हाँ मगर अब्बा का उन के वरग़लाना याद है
मसरूर शाहजहाँपुरी
ग़ज़ल
गिरीं बिजलियाँ मेरी राह पर कई आँधियाँ भी चलीं मगर
कभी बादलों सा झुका नहीं मिरा आसमाँ मिरा आसमाँ
