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ग़ज़ल
फिर तिरी चश्म-ए-सुख़न-संज ने छेड़ी कोई बात
वही जादू है वही हुस्न-ए-बयाँ है कि जो था
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
फिर तिरी चश्म-ए-सुख़न-संज ने छेड़ी कोई बात
वही जादू है वही हुस्न-ए-बयाँ है कि जो था
फ़िराक़ गोरखपुरी
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ग़ज़ल
उन की तरफ़ है चश्म-ए-सुख़न गो दम-ए-अख़ीर
उस के सिवा नहीं असर-ए-ज़िंदगी कुछ और
अली मंज़ूर हैदराबादी
शेर
नाज़ उधर दिल को उड़ा लेने की घातों में रहा
मैं इधर चश्म-ए-सुख़न-गो तिरी बातों में रहा
नातिक़ गुलावठी
नज़्म
पेच-ओ-ताब
फिर वही वा'दों पे लुत्फ़-ए-इंतिज़ार
फिर वही चश्म-ए-सुख़न-गो के इशारे बार बार
अमजद नजमी
नज़्म
पेच-ओ-ताब
फिर वही वा'दों पे लुत्फ़-ए-इंतिज़ार
फिर वही चश्म-ए-सुख़न-गो के इशारे बार-बार
अमजद नजमी
ग़ज़ल
तिरी चश्म-ए-सुख़न-गो का कोई अंदाज़ तो देखे
निहाँ कुछ और कहती है अयाँ कुछ और कहती है
तालिब देहलवी
ग़ज़ल
कहने को तो ऐ 'अर्श' सुख़न-संज हैं हम भी
हक़ ये है कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और
अर्श मलसियानी
नज़्म
अपनी मल्का-ए-सुख़न से
नग़्मे पले हैं दौलत-ए-गुफ़्तार से तिरी
पाया है नुत्क़ चश्म-ए-सुख़न-बार से तिरी
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
क्या करिश्मा ये तिरी चश्म-ए-सुख़न-गो ने किया
किस की जानिब था मिरा रू-ए-सुख़न भूल गया