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ग़ज़ल
तिश्ना तिश्ना से बदन में है शराबी नश्शा
चश्मा-ए-फ़ैज़ तिरी आँख से फिर जारी है
ख़ालिद मलिक साहिल
नज़्म
तज्दीद-ए-अमल
कर फ़िक्र-ए-अमल ज़िक्र-ए-ख़त-ओ-ख़ाल अबस है
ऐ 'फ़ैज़' ज़रा अपने ख़यालात बदल डाल
फ़ैज़ लुधियानवी
नज़्म
मौज़ू-ए-सुख़न
गुल हुई जाती है अफ़्सुर्दा सुलगती हुई शाम
धुल के निकलेगी अभी चश्मा-ए-महताब से रात
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
वही चश्मा-ए-बक़ा था जिसे सब सराब समझे
वही ख़्वाब मो'तबर थे जो ख़याल तक न पहुँचे

