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नज़्म
होली
जब आई होली रंग-भरी सौ नाज़-ओ-अदा से मटक मटक
और घूँघट के पट खोल दिए वो रूप दिखला चमक चमक
नज़ीर अकबराबादी
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नज़्म
लफ़्ज़ों के खेल
ये आराम-देह बिस्तर पर हम से हम-बिसतरी करते हैं
और कभी हमारी आँवल नाल से चिपक जाते हैं
अज़रा अब्बास
नज़्म
आख़िरी मौसम
चिपक रही हो तमाम माहौल के मनाज़िर की माँदगी भी
हर एक झोंके की ख़स्तगी भी
राजेन्द्र मनचंदा बानी
नज़्म
सियाह चाँद के टुकड़ों को मैं चबा जाऊँ
लहू का ज़ाइक़ा दाँतों में मुस्कुराने लगे
अगर ये हाथ मिरी पीठ पर चिपक जाएँ
आदिल मंसूरी
ग़ज़ल
लेटता हूँ तो चिपक जाती है क्यों इस से कमर
देखता हूँ झाड़ कर क्या ख़ासिय्यत बिस्तर में है

