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नज़्म
सिगरेट और पान का मुकालिमा
जो तुझे मुँह से लगाएँगे लहू थूकेंगे
और भी चीज़ों के कश लेने से कब चूकेंगे
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
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नज़्म
क्रिसमस का दरख़्त
बट चुकेंगे सारे तोहफ़े बुझ चुकेंगे बल्ब सब
मैं ड्राइंग-रूम की बे-कार शय हो जाऊँगा
शहज़ाद अहमद
ग़ज़ल
सजाए जा चुकेंगे जब बिसात-ए-अर्श के तारे
हमारा चाँद भी हँस कर हरीम-ए-दिल से निकलेगा
सय्यद सफ़दर हुसैन
ग़ज़ल
आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगे
ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
वो सुब्ह कभी तो आएगी
जब धरती करवट बदलेगी जब क़ैद से क़ैदी छूटेंगे
जब पाप घरौंदे फूटेंगे जब ज़ुल्म के बंधन टूटेंगे