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नज़्म
नई-देहली
'इर्विन' का कहीं बुत तो क्लाइव की कहीं स्ट्रीट
मैदान में सब्ज़े से बहार-ए-चमनी है
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
नक़्क़ाद
कैफ़ में इक ''लग़्ज़िश-ए-पा'' किल्क-ए-गौहर-बार की
''इज़्तिरारी एक जुम्बिश सी'' लब-ए-गुफ़्तार की
जोश मलीहाबादी
लेख
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
लेख
تھا۔ آپ کلیشے (Cliche) کو بہت برا کہتے ہیں لیکن آپ کی ساری تنقید کلیشے پر مبنی ہے۔ خیر چھوڑیے۔...
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
कहानी
’’ضمیر بھی تو وہی الفاظ استعمال کرتا ہے جو ہم لوگوں سے سنتے ہیں۔ یہ ایک کلیشے (Cliche) ہے۔‘‘...
रिफ़अत नाहीद सज्जाद
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ग़ज़ल
तुम तो करते हो मिरी क्लिक-ए-सुख़न को पाबंद
कौन है कातिब-ए-तक़दीर-ए-वतन क्या जानो?
परवेज़ शाहिदी
नज़्म
मुझे मोजिज़-बयाँ कर दो
जो लिक्खूँ वो क्लीशे है
मुरव्वज इस्तिआरों और तश्बीहों की उतरन से
