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ग़ज़ल
सालिम यक़ीन-ए-अज़्मत-ए-सेहर-ए-ख़ुदा न तोड़
मायूस हो के कासा-ए-दस्त-ए-दुआ न तोड़
सालिम शुजा अन्सारी
ग़ज़ल
तसव्वुर से नज़ारे तक फ़रोग़-ए-सेहर-ए-हैरत है
हक़ीक़त भी फ़साना है फ़साना भी हक़ीक़त है
ऋषि पटियालवी
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ग़ज़ल
हमें दा'वा था देखेंगे वो क्यूँकर याद आते हैं
रग-ए-जाँ बन गए हैं अब फ़ुज़ूँ-तर याद आते हैं
ए. डी. अज़हर
ग़ज़ल
'सेहर' उस निगाह-ए-मस्त पे क़ुर्बान क्यूँ न हो
जिस के करम ने ज़िंदा क़लंदर बना दिया
सेहर इश्क़ाबादी
ग़ज़ल
'सेहर' तो मुज्तहिद है ख़ुद क्यूँ हो मुक़ल्लिद और का
बहर ओ रदीफ़ ओ क़ाफ़िया है फ़न्न-ए-शाइरी अदक़
सेहर इश्क़ाबादी
ग़ज़ल
काबे से फिर आया वो बहर-ए-तवाफ़-ए-मय-कदा
'सेहर' की फ़ितरत में है अंदाज़-ए-रिंदाना अभी
सेहर इश्क़ाबादी
ग़ज़ल
उरूज-ए-जोश-ए-वहशत 'सेहर' है ये रोज़-ए-रौशन में
नज़र आते हैं तारे रौज़न-ए-दीवार-ए-ज़िंदाँ से
सेहर इश्क़ाबादी
ग़ज़ल
इस तरह में ग़ज़ल का लिखना है ग़ैर-मुमकिन
ऐ 'सेहर' कोई बाँधे गो अब हज़ार पांचों
मुंशी देबी प्रसाद सहर बदायुनी
ग़ज़ल
ऐ 'सेहर' क़द्र-दाँ जो न हो कोई शे'र का
तो ज़िंदगी है मौत सुख़नवर के वास्ते
मुंशी देबी प्रसाद सहर बदायुनी
ग़ज़ल
सुन के अशआ'र तिरे बज़्म-ए-सुख़न में ऐ 'सेहर'
वो फड़क जाएगा जो कोई सुख़न-दाँ होगा
मुंशी देबी प्रसाद सहर बदायुनी
ग़ज़ल
ऐ 'सेहर' नहीं जान की अब ख़ैर तुम्हारी
आती रही गर यूँही ये पैहम शब-ए-फ़ुर्क़त
मुंशी देबी प्रसाद सहर बदायुनी
ग़ज़ल
ऐ 'सेहर' क्या है दिल कहीं आया बताइए
कू-ए-बुताँ में रोज़ के जाने का क्या सबब
