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कुल्लियात
दाग़-ए-फ़िराक़ से क्या पूछो हो आग लगाई सीने में
छाती से वो मह न लगा टुक आ कर इस भी महीने में
मीर तक़ी मीर
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ग़ज़ल
वतन की याद मिटते मिटते मिट जाती है ग़ुर्बत में
क़फ़स में ताबिश-ए-दाग़-ए-फ़िराक़-ए-आशियाँ कब तक
तिलोकचंद महरूम
ग़ज़ल
ग़म-ए-दौराँ की रही या ग़म-ए-जानाँ की रही
अल-ग़रज़ छेड़ रही मंज़िल-ए-नाकाम के साथ