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ग़ज़ल
वो खड़ा है एक बाब-ए-इल्म की दहलीज़ पर
मैं ये कहता हूँ उसे इस ख़ौफ़ में दाख़िल न हो
मुनीर नियाज़ी
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नज़्म
ज़ोहद और रिंदी
समझा है कि है राग इबादात में दाख़िल
मक़्सूद है मज़हब की मगर ख़ाक उड़ानी
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
जो मुमकिन हो तो पुर-असरार दुनियाओं में दाख़िल हो
कि हर दीवार में इक चोर दरवाज़ा भी रहता है
साक़ी फ़ारुक़ी
ग़ज़ल
जो मेरी आँख से उस जिस्म में दाख़िल हुई होगी
वो लड़की फिर मिरे सीने में जा कर दिल हुई होगी
अर्पित शर्मा अर्पित
ग़ज़ल
चिल्ला-ए-जाँ पर चढ़ा कर आख़िरी साँसों के तीर
मौत की सरहद में दाख़िल ज़िंदगानी हो गई
इक़बाल साजिद
ग़ज़ल
दिल पे वो वक़्त भी किस दर्जा गिराँ होता है
ज़ब्त जब दाख़िल-ए-फ़रियाद-ओ-फ़ुग़ाँ होता है
आमिर उस्मानी
नज़्म
माज़ूरी
मैं कि मायूसी मिरी फ़ितरत में दाख़िल हो चुकी
जब्र भी ख़ुद पर करूँ तो गुनगुना सकता नहीं



