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ग़ज़ल
गुलों के दाम-ए-मोहब्बत में आ रहा हूँ मैं
फ़रेब हुस्न-ए-मजाज़ी का खा रहा हूँ मैं
बलदेव सिंह हमदम
ग़ज़ल
असीर-ए-दाम-ए-मोहब्बत कहाँ से हो आज़ाद
कि उन की ज़ुल्फ़ की ज़ंजीर जब रिहाई न दे
अहमद मुशर्रफ़ ख़ावर
ग़ज़ल
ऐ तिरे दाम-ए-मोहब्बत के दिल ओ जाँ सदक़े
शुक्र है क़ैद-ए-अलाइक़ से हम आज़ाद रहे
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
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ग़ज़ल
क़फ़स से छुट के भी हम क़ैद हैं दाम-ए-मोहब्बत में
'वसीम' आज़ाद कर के भी वो कब आज़ाद करते हैं
वसीम ख़ैराबादी
ग़ज़ल
भला क्यूँकर वो बचता आप के दाम-ए-मोहब्बत से
मुक़द्दर ही में था जिस के असीर-ए-रंज-ओ-ग़म होना
अनवारुल हक़ अहमर लखनवी
ग़ज़ल
आले रज़ा रज़ा
शेर
आले रज़ा रज़ा
ग़ज़ल
वो तलव्वुन-ए-दम-ए-होश था कभी कुछ बने कभी कुछ बने
ये जुनून-ए-इश्क़ की शान है जो बना दिया सो बना दिया
