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नज़्म
गर्ल्स कॉलेज की लारी
ये चलती ज़मीं पे निगाहें जमाती
वो होंटों में अपने क़लम को दबाती
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
बीवियाँ
ऐसे बहादुरों को दबाती हैं बीवियाँ
फिर उँगलियों पे उन को नचाती हैं बीवियाँ
नश्तर अमरोहवी
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नज़्म
रज़िया-सुल्ताना कोरंगी, ''के'' एरिया
छपर-खट पे अम्माँ के पाँव दबाती
वहीं बैठे बैठे हुए ऊँघ जाती
हारिस ख़लीक़
ग़ज़ल
भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे क़ामत की दराज़ी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-ख़म का पेच-ओ-ख़म निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
हम जो तारीक राहों में मारे गए
तेरी ज़ुल्फ़ों की मस्ती बरसती रही
तेरे हाथों की चाँदी दमकती रही
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
दोस्ती का हाथ
फ़क़त तुम्हीं को नहीं रंज-ए-चाक-दामानी
कि सच कहें तो दरीदा-लिबास हम भी हैं
अहमद फ़राज़
नज़्म
ख़ून फिर ख़ून है
तुम ने जिस ख़ून को मक़्तल में दबाना चाहा
आज वो कूचा ओ बाज़ार में आ निकला है


