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ग़ज़ल
सबा अकबराबादी
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
वो गोया उस की ही इक पुर-नुमू डाली से निकली है
ये कड़वाहट की बातें हैं मिठास इन की न पूछो तुम
जौन एलिया
नज़्म
ए'तिराफ़
ख़्वाब-गाहों में जगाई है जवानी मैं ने
हुस्न ने जब भी इनायत की नज़र डाली है
असरार-उल-हक़ मजाज़
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ग़ज़ल
ये अच्छी पर्दा-दारी है ये अच्छी राज़दारी है
कि जो आए तुम्हारी बज़्म में दीवाना हो जाए







