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ग़ज़ल
सबा अकबराबादी
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
तुम्हें मालूम है उर्दू जो है पाली से निकली है
वो गोया उस की ही इक पुर-नुमू डाली से निकली है
जौन एलिया
नज़्म
ए'तिराफ़
हुस्न ने जब भी इनायत की नज़र डाली है
मेरे पैमान-ए-मोहब्बत ने सिपर डाली है
असरार-उल-हक़ मजाज़
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नज़्म
दो इश्क़
आँखों से लगाया है कभी दस्त-ए-सबा को
डाली हैं कभी गर्दन-ए-महताब में बाहें
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
ये अच्छी पर्दा-दारी है ये अच्छी राज़दारी है
कि जो आए तुम्हारी बज़्म में दीवाना हो जाए







