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taa-dam-e-ziist
ता-दम-ए-ज़ीस्त تا دَمِ زِیسْت
जब तक आखिरी साँस है तब तक, अर्थात, उम्र भर, जीवनभर, जीते जी
Tuum kaap.De jis ghar paave.n, ek chho.D das baiyar aave.n
टूम कापड़े जिस घर पावें, ऐक छोड़ दस बइयर आवें ٹُوم کَاپْڑے جس گَھر پاویں، ایک چھوڑ دس بَیّر آویں
Tuum kap.De jis ghar paave.n, ek chho.D das bair aave.n
टूम कपड़े जिस घर पावें, ऐक छोड़ दस बैर आवें ٹُوم کَپْڑے جس گَھر پاویں، ایک چھوڑ دس بَیر آویں
अमीर आदमी चाहे तो जितनी शादियाँ मर्ज़ी से कर ले
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ग़ज़ल
किस की चीख़ों से लरज़ते हैं दर-ओ-दीवार सब
कौन है जो रात भर रोता है तेरे शहर में
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
ग़ज़ल
अभी महल के दर-ओ-बाम ना-मुकम्मल हैं
ये किस ने ख़्वाब से आ कर जगा दिया मुझ को
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
ग़ज़ल
गुम हुए जाते हैं धड़कन के निशाँ हम-नफ़सो
है दर-ए-दिल पे कोई संग-ए-गिराँ हम-नफ़सो
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
तुम इसे कह लो हिसाब-ए-दोस्ताँ-दर-दिल 'फ़ज़ा'
हम ने अपना नफ़अ' भी लौह-ए-ज़ियाँ पर लिख दिया
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
नहीं तर्जुमान-ए-बयाँ कोई जो है पर्दा-दार-ए-सुकूत है
हैं ये दाग़ दाग़ इबारतें बड़े एहतिमाल के दरमियाँ
बद्र-ए-आलम ख़लिश
नज़्म
अहल-ए-जुनूँ
हम वही अहल-ए-जुनूँ अहल-ए-वफ़ा साहिब-दिल
हम कि हर दौर में औराक़-ए-ज़माना के अमीं