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ग़ज़ल
शिकवा दराज़-दस्ती-ए-दिल का बजा मगर
आप ही के इल्तिफ़ात ने मिट्टी पलीद की
मोहम्मद शम्सुद्दीन आजिज़
ग़ज़ल
मुंतज़िर है दस्त-ए-क़ातिल में खुला ख़ंजर चलो
हम भी देखें आज अपने क़त्ल का मंज़र चलो
अज़ीज़ बघरवी
ग़ज़ल
कौन था जो दस्त-ए-क़ातिल के लिए तय्यार था
एक मैं ही बज़्म-ए-अहल-ए-ख़्वाब में बेदार था
आबिद जाफ़री
ग़ज़ल
दस्त-ए-क़ातिल में कोई तेग़ न ख़ंजर होता
मिरा साया जो मिरे क़द के बराबर होता