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ग़ज़ल
'जौहर' और हाजिब ओ दरबाँ की ख़ुशामद क्या ख़ूब
अर्श ओ कुर्सी पे गुज़र है तिरे दरबारी का
मौलाना मोहम्मद अली जौहर
नज़्म
अक़्ल बड़ी या भैंस
करना ख़ुदा का ऐसा हुआ इक रोज़ कोई हम-साया
राजा के दरबार में इक छोटी सी चूहिया लाया
क़तील शिफ़ाई
शेर
किसे बतलाएँ हम क्यों उस की महफ़िल में नहीं जाते
हुज़ूरी जिन को हासिल हो वो दरबारी नहीं करते
मोहम्मद आज़म
नज़्म
मुशाएरा
वो आ गया है उठा कर हज़ार दुश्वारी
चले जिलौ में उसे ले के उस के दरबारी


