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नज़्म
वतन का राग
ग़रीब माँ के लिए दर्द-दुख उठाएँगे
यही पयाम-ए-वफ़ा क़ौम को सुनाएँगे
चकबस्त बृज नारायण
ग़ज़ल
चैन वो इश्क़ में पाए हैं कि जी जानता है
दर्द दुख भी वो उठाए हैं कि जी जानता है