वतन का राग

MORE BYचकबस्त ब्रिज नारायण

    रोचक तथ्य

    1917

    ज़मीन हिन्द की रुत्बा में अर्श-ए-आ'ला है

    ये होम-रूल की उम्मीद का उजाला है

    मिसिज़-बेसेंट ने इस आरज़ू को पाला है

    फ़क़ीर क़ौम के हैं और ये राग माला है

    तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले

    लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले

    वतन-परस्त शहीदों की ख़ाक लाएँगे

    हम अपनी आँख का सुर्मा उसे बनाएँगे

    ग़रीब माँ के लिए दर्द-दुख उठाएँगे

    यही पयाम-ए-वफ़ा क़ौम को सुनाएँगे

    तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले

    लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले

    हमारे वास्ते ज़ंजीर-ओ-तौक़ गहना है

    वफ़ा के शौक़ में गाँधी ने जिस को पहना है

    समझ लिया कि हमें रंज-ओ-दर्द सहना है

    मगर ज़बाँ से कहेंगे वही जो कहना है

    तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले

    लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले

    पहनाने वाले अगर बेड़ियाँ पहनाएँगे

    ख़ुशी से क़ैद के गोशे को हम बसाएँगे

    जो संतरी दर-ए-ज़िंदाँ के भी सो जाएँगे

    ये राग गा के उन्हें नींद से जगाएँगे

    तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले

    लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले

    ज़बाँ को बंद किया है ये ग़ाफ़िलों को है नाज़

    ज़रा रगों में लहू का भी देख लें अंदाज़

    रहेगा जान के हम-राह दिल का सोज़-ओ-गुदाज़

    चिता से आएगी मरने के बा'द ये आवाज़

    तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले

    लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले

    यही दुआ है वतन के शिकस्ता हालों की

    यही उमंग जवानी के नौनिहालों की

    जो रहनुमा है मोहब्बत पे मिटने वालों की

    हमें क़सम है उसी के सपेद बालों की

    तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले

    लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले

    यही पयाम है कोयल का बाग़ के अंदर

    इसी हवा में है गंगा का ज़ोर आठ-पहर

    हिलाल-ए-ईद ने दी है यही दिलों को ख़बर

    पुकारता है हिमाला से अब्र उठ उठ कर

    तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले

    लें बहिश्त भी हम होमरूल के बदले

    बसे हुए हैं मोहब्बत से जिन की क़ौम के घर

    वतन का पास है उन को सुहाग से बढ़ कर

    जो शीर-ख़ार हैं हिन्दोस्ताँ के लख़्त-ए-जिगर

    ये माँ के दूध से लिक्खा है उन के सीने पर

    तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले

    लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले

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