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ग़ज़ल
रास्ता ही रास्ता था नक़्श-ए-पा था ही नहीं
दश्त-ए-वहशत में कोई अपने सिवा था ही नहीं
इक़बाल जहाँ क़दीर
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ग़ज़ल
नफ़्स-ए-सग-ए-पलीद को गर अपने मारिए
मानिंद-ए-शेर दश्त-ए-जहाँ में डकारिए
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
नज़्म
याद
दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ लर्ज़ां हैं
तेरी आवाज़ के साए तिरे होंटों के सराब
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
जल गया धूप में यादों का ख़ुनुक साया भी
बे-नवा दश्त-ए-बला में कोई हम सा भी नहीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
हम से मिल के फ़ितरत के पेच-ओ-ख़म को समझोगे
हम जहान-ए-फ़ितरत का इक सुराग़ हैं यारो