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नज़्म
शिकवा
दश्त तो दश्त हैं दरिया भी न छोड़े हम ने
बहर-ए-ज़ुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हम ने
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
उरूक़-मुर्दा-ए-मशरिक़ में ख़ून-ए-ज़िंदगी दौड़ा
समझ सकते नहीं इस राज़ को सीना ओ फ़ाराबी
अल्लामा इक़बाल
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ग़ज़ल
ख़ुदा की रहमतें ऐ मुतरिब-ए-रंगीं-नवा तुझ पर
कि हर काँटे में तू ने रूह दौड़ा दी गुलिस्ताँ की
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
उस की धुन में हर तरफ़ भागा किया दौड़ा किया
एक बूँद अमृत की ख़ातिर मैं समुंदर पी गया
कृष्ण बिहारी नूर
नज़्म
इल्म की ज़रूरत
निकम्मा कर दिया है काहिली ने गो हमें लेकिन
रगों में है हमारी ख़ून अभी तक दौड़ता फिरता
अहमक़ फफूँदवी
ग़ज़ल
सैर-ए-गुल करता था वो और आह बेताबी से मैं
हर तरफ़ गुलशन में जूँ आब-ए-रवाँ दौड़ा किया
जुरअत क़लंदर बख़्श
नज़्म
टूट बटूट ने खीर पकाई
जूँ-ही दस्तरख़्वान लगाया
गाँव का गाँव दौड़ा आया








