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शेर
वो जिन के ज़िक्र से रगों में दौड़ती थीं बिजलियाँ
उन्हीं का हाथ हम ने छू के देखा कितना सर्द है
बशीर बद्र
नज़्म
किसान
डूबता है ख़ाक में जो रूह दौड़ाता हुआ
मुज़्महिल ज़र्रों की मौसीक़ी को चौंकाता हुआ
जोश मलीहाबादी
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ग़ज़ल
हमारी आँखों से अश्क टपकें लबों पे मुस्कान दौड़ती हो
जो हम ने पहले कभी न पाया तू अब के ऐसा मलाल दे दे









