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नज़्म
मुफ़्लिसी
मालन गले की हार हो दौड़ी ले डालियाँ
सक़्क़ा खड़ा सुनाता है बातें रज़ालियाँ
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
इंक़लाब
मुझ को तेरे लहन-ए-दाऊदी से कब इंकार है
बज़्म-ए-हस्ती का मगर क्या रंग है ये भी तो देख
असरार-उल-हक़ मजाज़
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ग़ज़ल
अजब आलम है ईधर से हमें हस्ती सताती है
उधर से नीस्ती आती है दौड़ी उज़्र-ख़्वाही को
ख़्वाजा मीर दर्द
नज़्म
वक़्त-ए-मुरव्वत
गुलों के रंग में थी शान-ए-ख़ंदा-ए-यूसुफ़
कली के साज़ में था लुत्फ़-ए-नग़्मा-ए-दाऊद
जोश मलीहाबादी
नज़्म
जंग का अंजाम
एक ही चीख़ ने उस की पल में सास बहू का झगड़ा चुकाया
दौड़ी बहू मिरे लाल हुआ क्या सास पुकारी हाए ख़ुदाया
मीराजी
नज़्म
टूट बटूट ने खीर पकाई
जूँ-ही दस्तरख़्वान लगाया
गाँव का गाँव दौड़ा आया
सूफ़ी ग़ुलाम मुस्ताफ़ा तबस्सुम
नज़्म
दिसम्बर
सुब्ह-सलोनी गर्म चाय की प्याली ले कर दौड़ी
कैसा थर-थर काँप रहे हैं हाए दिसम्बर बाबा








