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ग़ज़ल
इस दिल के दरीदा दामन को देखो तो सही सोचो तो सही
जिस झोली में सौ छेद हुए उस झोली का फैलाना क्या
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
देखो ये मेरे ख़्वाब थे देखो ये मेरे ज़ख़्म हैं
मैं ने तो सब हिसाब-ए-जाँ बर-सर-ए-आम रख दिया
अहमद फ़राज़
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
जो है इक नंग-ए-हस्ती उस को तुम क्या जान भी लोगे
अगर तुम देख लो मुझ को तो क्या पहचान भी लोगे
जौन एलिया
ग़ज़ल
इलाज अपना कराते फिर रहे हो जाने किस किस से
मोहब्बत कर के देखो ना मोहब्बत क्यूँ नहीं करते
फ़रहत एहसास
ग़ज़ल
हाल-ए-दिल मुझ से न पूछो मिरी नज़रें देखो
राज़ दिल के तो निगाहों से अदा होते हैं
मजरूह सुल्तानपुरी
ग़ज़ल
फ़ना बुलंदशहरी
नज़्म
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना
किसी और से देखो दिल मत लगाना