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ग़ज़ल
जिस धज से कोई मक़्तल में गया वो शान सलामत रहती है
ये जान तो आनी जानी है इस जाँ की तो कोई बात नहीं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मौज़ू-ए-सुख़न
आज फिर हुस्न-ए-दिल-आरा की वही धज होगी
वही ख़्वाबीदा सी आँखें वही काजल की लकीर
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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नज़्म
उर्दू का जनाज़ा है ज़रा धूम से निकले
उर्दू के जनाज़े की ये सज-धज हो निराली
सफ़-बस्ता हों मरहूमा के सब वारिस-ओ-वाली
रईस अमरोहवी
ग़ज़ल
अब तो उस सूने माथे पर कोरे-पन की चादर है
अम्मा जी की सारी सज-धज सब ज़ेवर थे बाबू जी
आलोक श्रीवास्तव
हास्य
ज़ुल्फ़-ए-पेचाँ में वो सज-धज कि बलाएँ भी मुरीद
क़दर-ए-रअना में वो चम-ख़म कि क़यामत भी शहीद
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
काली दीवार
मुल्कों मुल्कों हम घूमे थे बंजारों की मिस्ल
लेकिन इस की सज-धज सच-मुच दिल-दारों की मिस्ल
अहमद फ़राज़
नज़्म
बरसात की बहारें
जंगल सब अपने तन पर हरियाली सज रहे हैं
गुल फूल झाड़-बूटे कर अपनी धज रहे हैं
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
यादें
वो इक बालक जिस को घर से इक दिरहम भी नहीं मिला
मेले की सज-धज में खो कर बाप की उँगली छोड़ गया
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
परछाइयाँ
ये धज न दे जो अजंता की सनअतों को पनाह
ये सीना पड़ ही गई देव लोक की भी निगाह
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
तख़्लीक़
मरहम-ए-अश्क नहीं ज़ख़्म-ए-तलब का चारा
ख़ूँ भी रोओगे तो किस ख़ाक की सज-धज होगी
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
इस रंग बदलती दुनिया में इंसान की निय्यत ठीक नहीं
निकला न करो तुम सज-धज कर ईमान की निय्यत ठीक नहीं
हसरत जयपुरी
नज़्म
होली
सब अब्रन तन पर झमक रहा और केसर का माथे टीका
हँस देना हर-दम नाज़-भरा दिखलाना सज-धज शोख़ी का
नज़ीर अकबराबादी
शेर
साँवले तन पे ग़ज़ब धज है बसंती शाल की
जी में है कह बैठिए अब जय कनहय्या लाल की


