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ग़ज़ल
सुला कर तेज़ धारों को किनारो तुम न सो जाना
रवानी ज़िंदगानी है तो धारो तुम न सो जाना
कौसर सीवानी
नज़्म
तुम ने लिक्खा है
इस से पहले कि मिरे इश्क़ पर इल्ज़ाम धरो
देख लो हुस्न की फ़ितरत में तो कुछ झोल नहीं
प्रेम वारबर्टनी
नज़्म
जरस-ए-गुल की सदा
जिस तरह फिरते हैं हम अहल-ए-जुनूँ आवारा
हम पे वारफ़्तगी-ए-होश की तोहमत न धरो
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ग़ज़ल
फ़ेलुन फ़ेलुन करने से अशआर नहीं बनते हैं दोस्त
धारो धार लहू गिरता है मिसरा मिसरा बनता है
इफ़्तिख़ार हैदर
ग़ज़ल
बहते हुए अश्को रुक जाओ अरमान के धारो थम जाओ
देखो तो तसव्वुर में मेरे साजन वो सलोना आता है



