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नज़्म
रक़ीब से!
तू ने देखी है वो पेशानी वो रुख़्सार वो होंट
ज़िंदगी जिन के तसव्वुर में लुटा दी हम ने
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
शिकवा
आतिश-अंदोज़ किया इश्क़ का हासिल तू ने
फूँक दी गर्मी-ए-रुख़्सार से महफ़िल तू ने
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इतना मालूम है!
मुझ को पूछा था मुझे ढूँडा था चारों जानिब?
उस ने इक लम्हे को देखा मुझे और फिर हँस दी
परवीन शाकिर
ग़ज़ल
वाइ'ज़ कमाल-ए-तर्क से मिलती है याँ मुराद
दुनिया जो छोड़ दी है तो उक़्बा भी छोड़ दे
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
मैं नज़र से पी रहा था तो ये दिल ने बद-दुआ दी
तिरा हाथ ज़िंदगी भर कभी जाम तक न पहुँचे




