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ग़ज़ल
जौन एलिया
नज़्म
दो इश्क़
फिर देखे हैं वो हिज्र के तपते हुए दिन भी
जब फ़िक्र-ए-दिल-ओ-जाँ में फ़ुग़ाँ भूल गई है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
परछाइयाँ
कि आरज़ू के कँवल खिल के फूल हो जाएँ
दिल-ओ-नज़र की दुआएँ क़ुबूल हो जाएँ
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
हम तो मजबूर-ए-वफ़ा हैं
मबादा हो कोई ज़ालिम तिरा गरेबाँ-गीर
लहू के दाग़ तू दामन से धो, हुआ सो हुआ''
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
रेत भरी है इन आँखों में आँसू से तुम धो लेना
कोई सूखा पेड़ मिले तो उस से लिपट के रो लेना
बशीर बद्र
ग़ज़ल
वही शख़्स जिस पे अपने दिल-ओ-जाँ निसार कर दूँ
वो अगर ख़फ़ा नहीं है तो ज़रूर बद-गुमाँ है
बशीर बद्र
ग़ज़ल
क़त्ल-ए-दिल-ओ-जाँ अपने सर है अपना लहू अपनी गर्दन पे
मोहर-ब-लब बैठे हैं किस का शिकवा किस के साथ करें



