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ग़ज़ल
इक तबस्सुम के तसव्वुर में फ़िदा जान न कर
इतनी ता’जील अभी ओ दिल-ए-जाँ-बाज़ नहीं
बिशन दयाल शाद देहलवी
ग़ज़ल
किस दिलेरी से करे है तू फ़िदा जान उस पर
दिल-ए-जाँ-बाज़ तिरा हम भी हुनर देखें तो
हसरत अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
दिल-ए-जाँ-बाज़ को भी अबरू-ए-क़ातिल है पसंद
जिस तरह मर्द सिपाही को हो तलवार अज़ीज़
मोहम्मद ज़करिय्या ख़ान
ग़ज़ल
किस तरह वाक़िफ़ हों हाल-ए-आशिक़-ए-जाँ-बाज़ से
उन को फ़ुर्सत ही नहीं है कारोबार-ए-नाज़ से
ग़ुलाम भीक नैरंग
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baa-dil-o-jaan
बा-दिल-ओ-जानبا دِل و جان
जान-ओ-दिल से, हर तरह पूरी कोशिश के साथ
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ग़ज़ल
जनाज़ा धूम से उस आशिक़-ए-जाँ-बाज़ का निकले
तमाशे को अजब क्या वो बुत-ए-दम-बाज़ आ निकले
रंजूर अज़ीमाबादी
शेर
हम में बाक़ी नहीं अब ख़ालिद-ए-जाँ-बाज़ का रंग
दिल पे ग़ालिब है फ़क़त हाफ़िज़-ए-शीराज़ का रंग
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
नूर-ए-ईमाँ सुर्मा-ए-चश्म-ए-दिल-ओ-जाँ कीजिए
पर्दा-दार-ए-हुस्न-ए-यकता चश्म-ए-हैराँ कीजिए

