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ग़ज़ल
दिल-ए-कम-अलम पे वो कैफ़ियत कि ठहर सके न गुज़र सके
न हज़र ही राहत-ए-रूह था न सफ़र में रामिश राह थी
अहमद मुश्ताक़
ग़ज़ल
किसी को देख कर बे-ख़ुद दिल-ए-काम हो जाना
उसी को लोग कहते हैं ख़याल-ए-ख़ाम हो जाना
हफ़ीज़ जौनपुरी
ग़ज़ल
फ़रेबों से न बहलेगा दिल-ए-आशुफ़्ता-काम अपना
ब-ज़ाहिर मुस्कुरा कर देखने वाले सलाम अपना
महशर इनायती
ग़ज़ल
ख़ूगर-ए-ऐश-ओ-मसर्रत दिल-ए-ख़ुद-काम नहीं
है ये आराम की सूरत मगर आराम नहीं
नवाब सय्यद हकीम अहमद नक़्बी बदायूनी
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रेख़्ता शब्दकोश
dekh paraa.ii chop.Dii gir pa.D be-iimaan, ek gha.Dii kii be-hayaa.ii din bhar kaa aaraam
देख पराई चोपड़ी गिर पड़ बे-ईमान, एक घड़ी की बे-हयाई दिन भर का आराम دیکھ پرائی چوپڑی گر پڑ بے ایمان، اک گھڑی کی بے حیائی دن بھر کا آرام
लालची व्यक्ति के प्रति कहते हैं कि दूसरे का माल हथियाने का प्रयास करता है, अपमान की परवाह नहीं करता
fauj-e-Gam-o-alam kii dil par cha.Dhaa.ii honaa
फ़ौज-ए-ग़म-ओ-अलम की दिल पर चढ़ाई होना فَوجِ غَم و اَلَم کی دِل پَر چَڑھائی ہونا
अत्यधिक दुःखी होना
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ग़ज़ल
चश्म-ए-साक़ी में है जिस दिन से मिरा शीशा-ए-दिल
आलम-ए-कार-गह-ए-शीशा-गराँ रक़्स में है
दिल अय्यूबी
ग़ज़ल
बदला न मेरा रंज-ओ-अलम हाए रे क़िस्मत
दिल और मचल जाता है दिल-गीर के आगे
मक़्सूद आलम ख़ाँ आलम बरेलवी
ग़ज़ल
फिर किसी के काम आए ये तो इस क़ाबिल नहीं
रह गया है बन के 'आलम' दिल ये काशाना तिरा
मक़्सूद आलम ख़ाँ आलम बरेलवी
ग़ज़ल
'अलम’ रब्त-ए-दिल-ओ-पैकाँ अब इस आलम को पहुँचा है
कि हम पैकाँ को दिल दिल को कभी पैकाँ समझते हैं

